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श्लोक 6.7.9  |
ततो निर्गत्य सहसा कविराङ्गिरस: प्रभु: ।
आययौ स्वगृहं तूष्णीं विद्वान्श्रीमदविक्रियाम् ॥ ९ ॥ |
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| अनुवाद |
| बृहस्पति जी को सब कुछ पता था कि आगे क्या होने जा रहा है। इंद्र द्वारा सभी शिष्टाचारों का उल्लंघन देखकर वे अच्छी तरह से समझ गये थे कि इंद्र ऐश्वर्य के नशे में चूर हो गये हैं। वे चाहें तो इंद्र को शाप दे सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे उस सभा से निकलकर चुपचाप अपने घर चले आये। |
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| बृहस्पति जी को सब कुछ पता था कि आगे क्या होने जा रहा है। इंद्र द्वारा सभी शिष्टाचारों का उल्लंघन देखकर वे अच्छी तरह से समझ गये थे कि इंद्र ऐश्वर्य के नशे में चूर हो गये हैं। वे चाहें तो इंद्र को शाप दे सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे उस सभा से निकलकर चुपचाप अपने घर चले आये। |
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