श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  6.7.36 
अकिञ्चनानां हि धनं शिलोञ्छनं
तेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रिय: ।
कथं विगर्ह्यं नु करोम्यधीश्वरा:
पौरोधसं हृष्यति येन दुर्मति: ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
हे लोकपालो! सच्चा ब्राह्मण वह होता है जिसके पास कोई भौतिक सम्पत्ति न हो, वह शिलोच्छन वृत्ति से ही अपना पेट पालता है। अर्थात् खेतों में गिरे हुए और बड़े हाट-स्थलों पर गिरे हुए अन्न को बीनता है। इस तरह से गृहस्थ ब्राह्मण जो वास्तव में तपस्या के सिद्धांत का पालन करते हुए स्वयं का और अपने परिवार का भरण करता है और आवश्यक पुण्य कर्म करता रहता है। जो ब्राह्मण पुरोहिती कर्म से धन कमाकर सुखी बनना चाहता है, वह बहुत ही तुच्छ मन वाला होता है। बताओ मैं ऐसी पुरोहिती को कैसे स्वीकार करूँ?
 
हे लोकपालो! सच्चा ब्राह्मण वह होता है जिसके पास कोई भौतिक सम्पत्ति न हो, वह शिलोच्छन वृत्ति से ही अपना पेट पालता है। अर्थात् खेतों में गिरे हुए और बड़े हाट-स्थलों पर गिरे हुए अन्न को बीनता है। इस तरह से गृहस्थ ब्राह्मण जो वास्तव में तपस्या के सिद्धांत का पालन करते हुए स्वयं का और अपने परिवार का भरण करता है और आवश्यक पुण्य कर्म करता रहता है। जो ब्राह्मण पुरोहिती कर्म से धन कमाकर सुखी बनना चाहता है, वह बहुत ही तुच्छ मन वाला होता है। बताओ मैं ऐसी पुरोहिती को कैसे स्वीकार करूँ?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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