श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  6.7.35 
श्रीविश्‍वरूप उवाच
विगर्हितं धर्मशीलैर्ब्रह्मवर्चउपव्ययम् ।
कथं नु मद्विधो नाथा लोकेशैरभियाचितम् ।
प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्य: स एव स्वार्थ उच्यते ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
श्री विश्वरूप ने कहा, हे देवगणों! यद्यपि पुरोहिती को स्वीकारने पर पूर्व अर्जित ब्राह्मणत्व की हानि होती है परन्तु आप जैसे महानों के अनुरोध को मैं कैसे ठुकरा सकता हूँ? आप सभी महान् आकाश और पृथ्वी के श्रेष्ठ हैं। मैं आपका शिष्य हूँ और मुझको आपसे कई बातें सीखने को मिल सकती है। अतः मैं आपसे इनकार नहीं कर सकता हूँ। मैं स्वयं के हित के लिए स्वीकार करता हूँ।
 
श्री विश्वरूप ने कहा, हे देवगणों! यद्यपि पुरोहिती को स्वीकारने पर पूर्व अर्जित ब्राह्मणत्व की हानि होती है परन्तु आप जैसे महानों के अनुरोध को मैं कैसे ठुकरा सकता हूँ? आप सभी महान् आकाश और पृथ्वी के श्रेष्ठ हैं। मैं आपका शिष्य हूँ और मुझको आपसे कई बातें सीखने को मिल सकती है। अतः मैं आपसे इनकार नहीं कर सकता हूँ। मैं स्वयं के हित के लिए स्वीकार करता हूँ।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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