श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 2-8
 
 
श्लोक  6.7.2-8 
श्रीबादरायणिरुवाच
इन्द्रस्त्रिभुवनैश्वर्यमदोल्लङ्घितसत्पथ: ।
मरुद्भ‍िर्वसुभी रुद्रैरादित्यैर्ऋभुभिर्नृप ॥ २ ॥
विश्वेदेवैश्च साध्यैश्च नासत्याभ्यां परिश्रित: ।
सिद्धचारणगन्धर्वैर्मुनिभिर्ब्रह्मवादिभि: ॥ ३ ॥
विद्याधराप्सरोभिश्च किन्नरै: पतगोरगै: ।
निषेव्यमाणो मघवान्स्तूयमानश्च भारत ॥ ४ ॥
उपगीयमानो ललितमास्थानाध्यासनाश्रित: ।
पाण्डुरेणातपत्रेण चन्द्रमण्डलचारुणा ॥ ५ ॥
युक्तश्चान्यै: पारमेष्ठ्यैश्चामरव्यजनादिभि: ।
विराजमान: पौलम्या सहार्धासनया भृशम् ॥ ६ ॥
स यदा परमाचार्यं देवानामात्मनश्च ह ।
नाभ्यनन्दत सम्प्राप्तं प्रत्युत्थानासनादिभि: ॥ ७ ॥
वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम् ।
नोच्चचालासनादिन्द्र: पश्यन्नपि सभागतम् ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा- हे राजन! एक बार तीनों लोकों के ऐश्वर्य से अत्यधिक गर्वित हो जाने के कारण स्वर्ग के राजा इंद्र ने वैदिक आचार-संहिता का उल्लंघन कर दिया। इंद्र अपने सिंहासन पर विराजमान थे और उनके चारों ओर मरुत, वसु, रुद्र, आदित्य, ऋभु, विश्वदेव, साध्य, अश्विनी-कुमार, सिद्ध, चारण, गंधर्व तथा सभी बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के अतिरिक्त विद्याधर, अप्सराएँ, किन्नर, पतग (पक्षी) और उरग (सर्प) भी विराजमान थे। वे सभी इंद्र की स्तुति और सेवा कर रहे थे, और अप्सराएँ और गंधर्व नृत्य कर रहे थे और अपने मधुर वाद्ययंत्रों के साथ गायन कर रहे थे। इंद्र के सर पर पूर्ण चंद्रमा के समान तेजस्वान श्वेत छत्र तना था, चँवर झला जा रहा था और समस्त राजसी ठाठ-बाट सजा हुआ था। इंद्र अपनी अर्धांगिनी शचीदेवी सहित सिंहासन पर विराजमान थे तभी उस सभा में परम साधु बृहस्पति का प्रवेश हुआ। सर्वश्रेष्ठ साधु बृहस्पति इंद्र समेत सभी देवताओं के गुरु थे और देवताओं और असुरों के द्वारा समान रूप से सम्मानित थे। तो भी अपने गुरु को समक्ष देखकर इंद्र न तो अपने आसन से उठे, न अपने गुरु को बैठने के लिए आसन दिया और न ही उनका आदरपूर्वक सत्कार किया। तात्पर्य यह है कि इंद्र ने सम्मानसूचक कोई भी कार्य नहीं किया।
 
शुकदेव गोस्वामी ने कहा- हे राजन! एक बार तीनों लोकों के ऐश्वर्य से अत्यधिक गर्वित हो जाने के कारण स्वर्ग के राजा इंद्र ने वैदिक आचार-संहिता का उल्लंघन कर दिया। इंद्र अपने सिंहासन पर विराजमान थे और उनके चारों ओर मरुत, वसु, रुद्र, आदित्य, ऋभु, विश्वदेव, साध्य, अश्विनी-कुमार, सिद्ध, चारण, गंधर्व तथा सभी बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के अतिरिक्त विद्याधर, अप्सराएँ, किन्नर, पतग (पक्षी) और उरग (सर्प) भी विराजमान थे। वे सभी इंद्र की स्तुति और सेवा कर रहे थे, और अप्सराएँ और गंधर्व नृत्य कर रहे थे और अपने मधुर वाद्ययंत्रों के साथ गायन कर रहे थे। इंद्र के सर पर पूर्ण चंद्रमा के समान तेजस्वान श्वेत छत्र तना था, चँवर झला जा रहा था और समस्त राजसी ठाठ-बाट सजा हुआ था। इंद्र अपनी अर्धांगिनी शचीदेवी सहित सिंहासन पर विराजमान थे तभी उस सभा में परम साधु बृहस्पति का प्रवेश हुआ। सर्वश्रेष्ठ साधु बृहस्पति इंद्र समेत सभी देवताओं के गुरु थे और देवताओं और असुरों के द्वारा समान रूप से सम्मानित थे। तो भी अपने गुरु को समक्ष देखकर इंद्र न तो अपने आसन से उठे, न अपने गुरु को बैठने के लिए आसन दिया और न ही उनका आदरपूर्वक सत्कार किया। तात्पर्य यह है कि इंद्र ने सम्मानसूचक कोई भी कार्य नहीं किया।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas