श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  6.7.16 
एवं चिन्तयतस्तस्य मघोनो भगवान् गृहात् ।
बृहस्पतिर्गतोऽद‍ृष्टां गतिमध्यात्ममायया ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
जब देवताओं के राजा इंद्र इस प्रकार सोच रहे थे और अपनी ही सभा में पश्चाताप कर रहे थे, तो परम शक्तिमान गुरु बृहस्पति ने उनकी भावना समझ ली। अतः वे स्वयं को इन्द्र के दृष्टिकोण से अदृश्य कर अपने घर से चले गए, क्योंकि राजा इंद्र की अपेक्षा बृहस्पति आत्मज्ञान में अधिक आगे थे।
 
जब देवताओं के राजा इंद्र इस प्रकार सोच रहे थे और अपनी ही सभा में पश्चाताप कर रहे थे, तो परम शक्तिमान गुरु बृहस्पति ने उनकी भावना समझ ली। अतः वे स्वयं को इन्द्र के दृष्टिकोण से अदृश्य कर अपने घर से चले गए, क्योंकि राजा इंद्र की अपेक्षा बृहस्पति आत्मज्ञान में अधिक आगे थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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