|
| |
| |
श्लोक 6.7.12  |
को गृध्येत्पण्डितो लक्ष्मीं त्रिपिष्टपपतेरपि ।
ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्वर: ॥ १२ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| यद्यपि मैं सतोगुणी देवताओं का राजा हूँ, परंतु थोड़े से ऐश्वर्य से गर्वित और अहंकार से दूषित था। ऐसी स्थिति में भला इस जगत में कौन ऐसा धन लेना चाहेगा जिससे उसका पतन हो? अफ़सोस! मेरे धन और ऐश्वर्य को धिक्कार है! |
| |
| यद्यपि मैं सतोगुणी देवताओं का राजा हूँ, परंतु थोड़े से ऐश्वर्य से गर्वित और अहंकार से दूषित था। ऐसी स्थिति में भला इस जगत में कौन ऐसा धन लेना चाहेगा जिससे उसका पतन हो? अफ़सोस! मेरे धन और ऐश्वर्य को धिक्कार है! |
| ✨ ai-generated |
| |
|