श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.7.12 
को गृध्येत्पण्डितो लक्ष्मीं त्रिपिष्टपपतेरपि ।
ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्वर: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैं सतोगुणी देवताओं का राजा हूँ, परंतु थोड़े से ऐश्वर्य से गर्वित और अहंकार से दूषित था। ऐसी स्थिति में भला इस जगत में कौन ऐसा धन लेना चाहेगा जिससे उसका पतन हो? अफ़सोस! मेरे धन और ऐश्वर्य को धिक्कार है!
 
यद्यपि मैं सतोगुणी देवताओं का राजा हूँ, परंतु थोड़े से ऐश्वर्य से गर्वित और अहंकार से दूषित था। ऐसी स्थिति में भला इस जगत में कौन ऐसा धन लेना चाहेगा जिससे उसका पतन हो? अफ़सोस! मेरे धन और ऐश्वर्य को धिक्कार है!
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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