| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य » अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप » श्लोक 44 |
|
| | | | श्लोक 6.5.44  | श्रीशुक उवाच
प्रतिजग्राह तद्बाढं नारद: साधुसम्मत: ।
एतावान्साधुवादो हि तितिक्षेतेश्वर: स्वयम् ॥ ४४ ॥ | | | | | | अनुवाद | | श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : राजन्, नारद मुनि विख्यात साधु-महात्मा हैं, अतः जब प्रजापति दक्ष ने उन्हें शापित किया तो उन्होंने उत्तर दिया, “तद् बाढम्“: “ठीक है, तुमने जो भी कहा है अच्छा है। मैं इस शाप को स्वीकार करता हूँ।” वे चाहें तो प्रजापति दक्ष को भी श्राप दे सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि वे सहिष्णु और दयालु साधु हैं। | | | | श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : राजन्, नारद मुनि विख्यात साधु-महात्मा हैं, अतः जब प्रजापति दक्ष ने उन्हें शापित किया तो उन्होंने उत्तर दिया, “तद् बाढम्“: “ठीक है, तुमने जो भी कहा है अच्छा है। मैं इस शाप को स्वीकार करता हूँ।” वे चाहें तो प्रजापति दक्ष को भी श्राप दे सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि वे सहिष्णु और दयालु साधु हैं। | | | | इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध छह के अंतर्गत पाँचवाँ अध्याय समाप्त होता है । | | | | ✨ ai-generated | | |
|
|