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श्लोक 6.5.41  |
नानुभूय न जानाति पुमान् विषयतीक्ष्णताम् ।
निर्विद्यते स्वयं तस्मान्न तथा भिन्नधी: परै: ॥ ४१ ॥ |
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| अनुवाद |
| आवश्यक रूप से भौतिक सुखों की चाहत सभी दुखों का कारण है, लेकिन कोई इन्हें तभी तक नहीं छोड़ पाता जब तक वो स्वयं नहीं जान लेता कि यह कितना कष्टप्रद है। इसलिए मनुष्य को तथाकथित भौतिक सुखों में सम्मिलित रहने देना चाहिए और साथ ही उसे इस मिथ्या भौतिक सुख के कष्ट का अनुभव करने के ज्ञान में प्रगति करते रहने देना चाहिए। तब वह अन्य की सहायता के बिना स्वयं ही भौतिक सुखों को त्याज्य समझने लगेगा। जिनके मन को दूसरों द्वारा बदला जाता है, वे उतने विरक्त नहीं होते हैं जितने की निजी अनुभव प्राप्त व्यक्ति होते हैं। |
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| आवश्यक रूप से भौतिक सुखों की चाहत सभी दुखों का कारण है, लेकिन कोई इन्हें तभी तक नहीं छोड़ पाता जब तक वो स्वयं नहीं जान लेता कि यह कितना कष्टप्रद है। इसलिए मनुष्य को तथाकथित भौतिक सुखों में सम्मिलित रहने देना चाहिए और साथ ही उसे इस मिथ्या भौतिक सुख के कष्ट का अनुभव करने के ज्ञान में प्रगति करते रहने देना चाहिए। तब वह अन्य की सहायता के बिना स्वयं ही भौतिक सुखों को त्याज्य समझने लगेगा। जिनके मन को दूसरों द्वारा बदला जाता है, वे उतने विरक्त नहीं होते हैं जितने की निजी अनुभव प्राप्त व्यक्ति होते हैं। |
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