श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  6.5.40 
नेत्थं पुंसां विराग: स्यात् त्वया केवलिना मृषा ।
मन्यसे यद्युपशमं स्‍नेहपाशनिकृन्तनम् ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
प्रजापति दक्ष ने आगे कहा : यदि तुम यह सोचते हो कि सिर्फ वैराग्य की भावना जाग्रत कर देने से ही मनुष्य भौतिक जगत से विरक्त हो जाएगा, तो मैं कहूँगा कि पूर्ण ज्ञान के जाग्रत हुए बिना तुम्हारी तरह केवल वेश बदलने से सम्भवतः वैराग्य उत्पन्न नहीं हो सकता।
 
प्रजापति दक्ष ने आगे कहा : यदि तुम यह सोचते हो कि सिर्फ वैराग्य की भावना जाग्रत कर देने से ही मनुष्य भौतिक जगत से विरक्त हो जाएगा, तो मैं कहूँगा कि पूर्ण ज्ञान के जाग्रत हुए बिना तुम्हारी तरह केवल वेश बदलने से सम्भवतः वैराग्य उत्पन्न नहीं हो सकता।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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