श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  6.5.39 
ननु भागवता नित्यं भूतानुग्रहकातरा: ।
ऋते त्वां सौहृदघ्नं वै वैरङ्करमवैरिणाम् ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान् के सभी भक्त बद्धजीवों के प्रति बहुत दयालु हैं और दूसरों को लाभ पहुँचाने के इच्छुक रहते हैं, लेकिन आप उनसे बिल्कुल अलग हैं। आप भक्त का वेश तो धारण करते हैं, लेकिन उन लोगों से भी शत्रुता उत्पन्न करते हैं जो आपके शत्रु नहीं हैं। आप मित्रों के बीच भी मैत्री तोड़ते हैं और शत्रुता उत्पन्न करते हैं। क्या इन बुरे कामों को करते हुए भी आप अपने आप को भक्त कहलाने में शर्म नहीं आती?
 
भगवान् के सभी भक्त बद्धजीवों के प्रति बहुत दयालु हैं और दूसरों को लाभ पहुँचाने के इच्छुक रहते हैं, लेकिन आप उनसे बिल्कुल अलग हैं। आप भक्त का वेश तो धारण करते हैं, लेकिन उन लोगों से भी शत्रुता उत्पन्न करते हैं जो आपके शत्रु नहीं हैं। आप मित्रों के बीच भी मैत्री तोड़ते हैं और शत्रुता उत्पन्न करते हैं। क्या इन बुरे कामों को करते हुए भी आप अपने आप को भक्त कहलाने में शर्म नहीं आती?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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