श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  6.5.36 
श्रीदक्ष उवाच
अहो असाधो साधूनां साधुलिङ्गेन नस्त्वया ।
असाध्वकार्यर्भकाणां भिक्षोर्मार्ग: प्रदर्शित: ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
प्रजापति दक्ष ने कहा: अरे नारदमुनि! तुम सन्यासी का वेश धारण करते हो, पर तुम सन्यासी नहीं हो। मैं एक गृहस्थ हूँ पर मैं सन्यासी हूँ। मेरे पुत्रों को तुमने संन्यास की शिक्षा देकर मेरे साथ बहुत बड़ा अनर्थ किया है।
 
प्रजापति दक्ष ने कहा: अरे नारदमुनि! तुम सन्यासी का वेश धारण करते हो, पर तुम सन्यासी नहीं हो। मैं एक गृहस्थ हूँ पर मैं सन्यासी हूँ। मेरे पुत्रों को तुमने संन्यास की शिक्षा देकर मेरे साथ बहुत बड़ा अनर्थ किया है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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