श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  6.5.19 
कालचक्रं भ्रमि तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत् ।
स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
[नारद मुनि जी ने एक भौतिक वस्तु का वर्णन किया था जो तेज धार वाले छुरों और वज्रों से बनी हुई थी। हर्यश्वों ने इस रूपक की अपनी समझ को इस प्रकार बताया।] काल बहुत ही तेज़ी से गतिमान है, जैसे कि यह छुरों और वज्रों से निर्मित हो। यह अबाधित और स्वतंत्र रूप से पूरे जगत में चल रही गतिविधियों को संचालित कर रहा है। यदि कोई व्यक्ति काल तत्त्व का अध्ययन करने का प्रयास न करे तो उसको अस्थायी भौतिक कार्यों को करते हुए कौन सा लाभ हो सकता है?
 
[नारद मुनि जी ने एक भौतिक वस्तु का वर्णन किया था जो तेज धार वाले छुरों और वज्रों से बनी हुई थी। हर्यश्वों ने इस रूपक की अपनी समझ को इस प्रकार बताया।] काल बहुत ही तेज़ी से गतिमान है, जैसे कि यह छुरों और वज्रों से निर्मित हो। यह अबाधित और स्वतंत्र रूप से पूरे जगत में चल रही गतिविधियों को संचालित कर रहा है। यदि कोई व्यक्ति काल तत्त्व का अध्ययन करने का प्रयास न करे तो उसको अस्थायी भौतिक कार्यों को करते हुए कौन सा लाभ हो सकता है?
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