श्रीशुक उवाच
तन्निशम्याथ हर्यश्वा औत्पत्तिकमनीषया ।
वाच: कूटं तु देवर्षे: स्वयं विममृशुर्धिया ॥ १० ॥
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा: नारदमुनी के गूढ़ शब्दों को सुनकर हर्यश्वों ने अपनी स्वाभाविक बुद्धि से दूसरों की मदद के बिना विचार किया।
Sri Sukadeva Goswami said: After listening to the profound words of Narad Muni, the Hariyashvas thought over it using their natural intelligence without taking help from others.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥