श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 19: पुंसवन व्रत का अनुष्ठान  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  6.19.25 
एतच्चरित्वा विधिवद्‌व्रतं विभो
रभीप्सितार्थं लभते पुमानिह ।
स्त्री चैतदास्थाय लभेत सौभगं
श्रियं प्रजां जीवपतिं यशो गृहम् ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
यदि इस व्रत या अनुष्ठान को शास्त्रों में बताई गई विधि के अनुसार किया जाए, तो इसी जीवन में मनुष्य को ईश्वर से मनचाही आशीर्वाद (वर) प्राप्त हो सकते हैं। जो पत्नी इस अनुष्ठान को करती है, उसे सुहाग, ऐश्वर्य, पुत्र, लंबे समय तक स्वस्थ्य रहने वाले पति, ख्याति और एक अच्छा घर-बार मिलता है।
 
यदि इस व्रत या अनुष्ठान को शास्त्रों में बताई गई विधि के अनुसार किया जाए, तो इसी जीवन में मनुष्य को ईश्वर से मनचाही आशीर्वाद (वर) प्राप्त हो सकते हैं। जो पत्नी इस अनुष्ठान को करती है, उसे सुहाग, ऐश्वर्य, पुत्र, लंबे समय तक स्वस्थ्य रहने वाले पति, ख्याति और एक अच्छा घर-बार मिलता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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