श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 66-67
 
 
श्लोक  6.18.66-67 
सकृदिष्ट्वादिपुरुषं पुरुषो याति साम्यताम् ।
संवत्सरं किञ्चिदूनं दित्या यद्धरिरर्चित: ॥ ६६ ॥
सजूरिन्द्रेण पञ्चाशद्देवास्ते मरुतोऽभवन् ।
व्यपोह्य मातृदोषं ते हरिणा सोमपा: कृता: ॥ ६७ ॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई एक बार भी पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान की भक्ति करे, तो वे वैकुण्ठ में जाने के योग्य हो जाते हैं और भगवान विष्णु के समान रूप धारण कर लेते हैं। संकल्प पूर्वक नियमों का पालन करते हुए दिति ने लगभग एक वर्ष तक भगवान विष्णु की पूजा की। आध्यात्मिक जीवन की इस शक्ति से उनचास मरुद्रगण पैदा हुए। तब यह आश्चर्य की बात नहीं है कि दिति के गर्भ से जन्मे मरुद्रगण भगवान के कृपा से देवताओं के समान हो गये।
 
If one worships the Supreme Personality of Godhead even once, he becomes entitled to enter Vaikuntha and attain the form of Lord Vishnu. Diti worshipped Lord Vishnu for about a year, strictly following the rules with determination. Because of this power of spiritual life, forty-nine Marudraganas were born. Although the Marudraganas were born from the womb of Diti, by the grace of the Supreme Lord they became equal to the demigods, what a wonder it is!
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)