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श्लोक 6.18.63  |
तमूचु: पाट्यमानास्ते सर्वे प्राञ्जलयो नृप ।
किं न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव ॥ ६३ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन! हम बहुत दुखी हैं, इसलिए हाथ जोड़कर इंद्र से निवेदन करते हैं - "हे इंद्र! हम तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं। तुम हमें क्यों मार रहे हो?" |
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| हे राजन! हम बहुत दुखी हैं, इसलिए हाथ जोड़कर इंद्र से निवेदन करते हैं - "हे इंद्र! हम तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं। तुम हमें क्यों मार रहे हो?" |
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