| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य » अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत » श्लोक 57 |
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| | | | श्लोक 6.18.57  | नित्यं वनात्सुमनस: फलमूलसमित्कुशान् ।
पत्राङ्कुरमृदोऽपश्च काले काल उपाहरत् ॥ ५७ ॥ | | | | | | अनुवाद | | इंद्र प्रतिदिन जंगल से फूल, फल, कंद, समिधा तथा यज्ञ के लिए आवश्यक सामग्री ला कर अपनी मौसी की यथाशक्ति सेवा करने लगा। वह उचित समय पर कुश, पत्तियाँ, प्ररोह, मिट्टी तथा पानी भी लाता था। | | | | इंद्र प्रतिदिन जंगल से फूल, फल, कंद, समिधा तथा यज्ञ के लिए आवश्यक सामग्री ला कर अपनी मौसी की यथाशक्ति सेवा करने लगा। वह उचित समय पर कुश, पत्तियाँ, प्ररोह, मिट्टी तथा पानी भी लाता था। | | ✨ ai-generated | | |
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