श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  6.18.50 
नोच्छिष्टास्पृष्टसलिला सन्ध्यायां मुक्तमूर्धजा ।
अनर्चितासंयतवाक्नासंवीता बहिश्चरेत् ॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
भोजन कर लेने के बाद बिना मुँह, हाथ और पाँव धोये सड़क पर बाहर नहीं निकलो। तुम्हें न तो शाम को या बाल खुले हुए और न बिना आभूषणों के बाहर जाना चाहिए। जब तक तुम्हारी वाणी संयमित न हो और शरीर ठीक से ढका न हो, तब तक तुम्हें घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए।
 
भोजन कर लेने के बाद बिना मुँह, हाथ और पाँव धोये सड़क पर बाहर नहीं निकलो। तुम्हें न तो शाम को या बाल खुले हुए और न बिना आभूषणों के बाहर जाना चाहिए। जब तक तुम्हारी वाणी संयमित न हो और शरीर ठीक से ढका न हो, तब तक तुम्हें घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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