|
| |
| |
श्लोक 6.18.47  |
श्रीकश्यप उवाच
न हिंस्याद्भूतजातानि न शपेन्नानृतं वदेत् ।
न छिन्द्यान्नखरोमाणि न स्पृशेद्यदमङ्गलम् ॥ ४७ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| कश्यप मुनि बोले, हे पत्नी! इस व्रत के दौरान न तो क्रोधित होना है और न ही किसी को कष्ट पहुँचाना है। किसी को शाप नहीं देना है और न ही झूठ बोलना है। अपने नाखून व बाल न काटें और हड्डियाँ व खोपड़ी जैसी अशुद्ध वस्तुओं को छूना भी नहीं है। |
| |
| कश्यप मुनि बोले, हे पत्नी! इस व्रत के दौरान न तो क्रोधित होना है और न ही किसी को कष्ट पहुँचाना है। किसी को शाप नहीं देना है और न ही झूठ बोलना है। अपने नाखून व बाल न काटें और हड्डियाँ व खोपड़ी जैसी अशुद्ध वस्तुओं को छूना भी नहीं है। |
| ✨ ai-generated |
| |
|