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श्लोक 6.18.44  |
इति सञ्चिन्त्य भगवान्मारीच: कुरुनन्दन ।
उवाच किञ्चित् कुपित आत्मानं च विगर्हयन् ॥ ४४ ॥ |
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| अनुवाद |
| श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा- इस प्रकार विचार करते हुए कश्यप ऋषि थोड़ा-बहुत क्रोधित हो गये। हे कुरुवंशी महाराज परीक्षित! अपने आपको धिक्कारते हुए वे दिति से इस प्रकार बोले। |
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| श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा- इस प्रकार विचार करते हुए कश्यप ऋषि थोड़ा-बहुत क्रोधित हो गये। हे कुरुवंशी महाराज परीक्षित! अपने आपको धिक्कारते हुए वे दिति से इस प्रकार बोले। |
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