श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  6.18.38 
निशम्य तद्वचो विप्रो विमना: पर्यतप्यत ।
अहो अधर्म: सुमहानद्य मे समुपस्थित: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
कश्यप मुनि ने दिति के वरदान के अनुरोध पर बहुत चिंता व्यक्त की। उन्होंने पछताते हुए कहा, "हाय, अब मेरे सामने इंद्र को मारने का पापपूर्ण कार्य करने का ख़तरा आ गया है।"
 
कश्यप मुनि ने दिति के वरदान के अनुरोध पर बहुत चिंता व्यक्त की। उन्होंने पछताते हुए कहा, "हाय, अब मेरे सामने इंद्र को मारने का पापपूर्ण कार्य करने का ख़तरा आ गया है।"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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