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श्लोक 6.18.36  |
सोऽहं त्वयार्चितो भद्रे ईदृग्भावेन भक्तित: ।
तं ते सम्पादये काममसतीनां सुदुर्लभम् ॥ ३६ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रिय सद्गुणी पत्नी! तूने मुझे श्रीभगवान का प्रतिनिधि मानकर अपार श्रद्धा और भक्ति से पूजा की है। अतः मैं तेरी अभिलाषाओं को पूरा करके तुझे पुरस्कृत करूँगा, जो अ-सती पत्नी के लिए असंभव है। |
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| हे प्रिय सद्गुणी पत्नी! तूने मुझे श्रीभगवान का प्रतिनिधि मानकर अपार श्रद्धा और भक्ति से पूजा की है। अतः मैं तेरी अभिलाषाओं को पूरा करके तुझे पुरस्कृत करूँगा, जो अ-सती पत्नी के लिए असंभव है। |
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