श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  6.18.32 
श्रीकश्यप उवाच
वरं वरय वामोरु प्रीतस्तेऽहमनिन्दिते ।
स्त्रिया भर्तरि सुप्रीते क: काम इह चागम: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
कश्यप मुनि ने कहा- हे सुंदर स्त्री, मैं आपके आचरण से अत्यंत प्रसन्न हूँ, इसलिए आप चाहें जो भी वर माँग सकती हैं। अगर पति प्रसन्न हो तो इस दुनिया में या अगली दुनिया में पत्नी की कौन सी इच्छा पूरी नहीं हो सकती?
 
Sage Kashyap said, "Oh beautiful lady! I am extremely pleased with your conduct, therefore you can ask for any boon you want. If your husband is pleased, then what is that wish of this world or the other world that cannot be fulfilled?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)