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श्लोक 6.18.30  |
विलोक्यैकान्तभूतानि भूतान्यादौ प्रजापति: ।
स्त्रियं चक्रे स्वदेहार्धं यया पुंसां मतिर्हृता ॥ ३० ॥ |
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| अनुवाद |
| सृष्टि की रचना के आरंभ में ब्रह्मांड के प्राणियों के पिता भगवान ब्रह्मा ने देखा कि सभी प्राणी वैराग्य और मोक्ष के मार्ग पर चल पड़े हैं। अतः जनसंख्या को बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने पुरुष के आधे अंग से स्त्री की रचना की क्योंकि स्त्री का आकर्षक व्यवहार और सौंदर्य पुरुष के मन को मोह लेता है। |
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| सृष्टि की रचना के आरंभ में ब्रह्मांड के प्राणियों के पिता भगवान ब्रह्मा ने देखा कि सभी प्राणी वैराग्य और मोक्ष के मार्ग पर चल पड़े हैं। अतः जनसंख्या को बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने पुरुष के आधे अंग से स्त्री की रचना की क्योंकि स्त्री का आकर्षक व्यवहार और सौंदर्य पुरुष के मन को मोह लेता है। |
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