यद् यद् आचरती श्रेष्ठः
तत् तद् एवेतरो जनः
स यत् प्रमाणं कुरुते
लोकस तद अनुवर्तते
"एक महान व्यक्ति जो भी कार्य करता है, आम लोग उसका अनुसरण करते हैं। और जो भी मानक वह अनुकरणीय कार्यों द्वारा निर्धारित करता है, सारा संसार उसका अनुसरण करता है।" एक आम व्यक्ति भी भगवान शिव की आलोचना कर सकता है, जैसे दक्ष, जिन्हें उनकी आलोचना के परिणाम भुगतने पड़े। राजा चित्रकेतु चाहते थे कि भगवान शिव इस बाहरी व्यवहार को बंद कर दें ताकि अन्य लोग उनकी आलोचना करने और इस प्रकार अपराधी बनने से बच जाएं। यदि कोई सोचता है कि विष्णु, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, एकमात्र पूर्ण व्यक्तित्व है जबकि देवता, भगवान शिव जैसे देवताओं को भी अनुचित सामाजिक मामलों का झुकाव है, तो वह अपराधी है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, राजा चित्रकेतु ने भगवान शिव के साथ अपने व्यवहार में कुछ कठोरता दिखाई। भगवान शिव, जो हमेशा ज्ञान में निमग्न रहते हैं, चित्रकेतु के उद्देश्य को समझ सकते थे, और इसलिए वह बिल्कुल भी नाराज नहीं हुए; बल्कि, वे बस मुस्कुराए और चुप रहे। भगवान शिव के चारों ओर बैठे विधानसभा के सदस्य भी चित्रकेतु के उद्देश्य को समझ सकते थे। परिणामस्वरूप, भगवान शिव के व्यवहार का पालन करते हुए, उन्होंने विरोध नहीं किया; इसके बजाय, अपने गुरु का अनुसरण करते हुए, वे चुप रहे। यदि विधानसभा के सदस्यों को लगता कि चित्रकेतु ने भगवान शिव की निंदा की है, तो वे निश्चित रूप से तुरंत निकल जाते, अपने हाथों से अपने कान बंद कर लेते।
