श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  6.17.9 
श्रीशुक उवाच
भगवानपि तच्छ्रुत्वा प्रहस्यागाधधीर्नृप ।
तूष्णीं बभूव सदसि सभ्याश्च तदनुव्रता: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा- हे राजा! परम बलशाली, अथाह ज्ञान वाले देवाधिदेव शिव ने चित्रकेतु के वचन सुनकर केवल मुस्करा दिया और मौन रहे। सभा के सभी सदस्यों ने भी उनका अनुसरण किया और कुछ नहीं कहा।
 
Sri Shukdev Goswami further said—O King! On hearing the words of Chitraketu, the most powerful and knowledgeable God Shiva only laughed and remained silent. All the members of the assembly also followed him and did not say anything.
तात्पर्य
शिव की आलोचना करने में चित्रकेतु का उद्देश्य कुछ रहस्यमय है और एक सामान्य आदमी उसे समझ नहीं सकता है। किंतु श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने निम्नलिखित अवलोकन किए हैं। भगवान शिव सबसे अधिक उन्नत वैष्णव और सबसे शक्तिशाली देवताओं में से एक होने के कारण वह कुछ भी कर सकते हैं जो वह चाहें। यद्यपि वह बाहरी रूप से एक आम आदमी के व्यवहार का प्रदर्शन कर रहे थे और शिष्टाचार का पालन नहीं कर रहे थे, किंतु ऐसे कार्य उनके ऊंचे पद को कम नहीं कर सकते हैं। कठिनाई यह है कि एक सामान्य व्यक्ति, भगवान शिव के व्यवहार को देखकर, उसका अनुसरण कर सकता है। जैसा कि भगवद गीता (3.21) में कहा गया है:

यद् यद् आचरती श्रेष्ठः

तत् तद् एवेतरो जनः

स यत् प्रमाणं कुरुते

लोकस तद अनुवर्तते

"एक महान व्यक्ति जो भी कार्य करता है, आम लोग उसका अनुसरण करते हैं। और जो भी मानक वह अनुकरणीय कार्यों द्वारा निर्धारित करता है, सारा संसार उसका अनुसरण करता है।" एक आम व्यक्ति भी भगवान शिव की आलोचना कर सकता है, जैसे दक्ष, जिन्हें उनकी आलोचना के परिणाम भुगतने पड़े। राजा चित्रकेतु चाहते थे कि भगवान शिव इस बाहरी व्यवहार को बंद कर दें ताकि अन्य लोग उनकी आलोचना करने और इस प्रकार अपराधी बनने से बच जाएं। यदि कोई सोचता है कि विष्णु, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, एकमात्र पूर्ण व्यक्तित्व है जबकि देवता, भगवान शिव जैसे देवताओं को भी अनुचित सामाजिक मामलों का झुकाव है, तो वह अपराधी है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, राजा चित्रकेतु ने भगवान शिव के साथ अपने व्यवहार में कुछ कठोरता दिखाई। भगवान शिव, जो हमेशा ज्ञान में निमग्न रहते हैं, चित्रकेतु के उद्देश्य को समझ सकते थे, और इसलिए वह बिल्कुल भी नाराज नहीं हुए; बल्कि, वे बस मुस्कुराए और चुप रहे। भगवान शिव के चारों ओर बैठे विधानसभा के सदस्य भी चित्रकेतु के उद्देश्य को समझ सकते थे। परिणामस्वरूप, भगवान शिव के व्यवहार का पालन करते हुए, उन्होंने विरोध नहीं किया; इसके बजाय, अपने गुरु का अनुसरण करते हुए, वे चुप रहे। यदि विधानसभा के सदस्यों को लगता कि चित्रकेतु ने भगवान शिव की निंदा की है, तो वे निश्चित रूप से तुरंत निकल जाते, अपने हाथों से अपने कान बंद कर लेते।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)