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श्लोक 6.17.8  |
प्रायश: प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति ।
अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम् ॥ ८ ॥ |
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| अनुवाद |
| आम इन्सान शारीरिक सम्बन्धों के लिए एकान्त ही पसन्द करते हैं और अपनी पत्नी के साथ एकान्त में ही भोग करते हैं। यह कितनी विचित्र बात है कि इतने बड़े तपस्वी भगवान महादेव जी परम साधुओं की सभा में भी सबको देखते हुए अपनी पत्नी का आलिंगन कर रहे हैं! |
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| आम इन्सान शारीरिक सम्बन्धों के लिए एकान्त ही पसन्द करते हैं और अपनी पत्नी के साथ एकान्त में ही भोग करते हैं। यह कितनी विचित्र बात है कि इतने बड़े तपस्वी भगवान महादेव जी परम साधुओं की सभा में भी सबको देखते हुए अपनी पत्नी का आलिंगन कर रहे हैं! |
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