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श्लोक 6.17.41  |
य एतत्प्रातरुत्थाय श्रद्धया वाग्यत: पठेत् ।
इतिहासं हरिं स्मृत्वा स याति परमां गतिम् ॥ ४१ ॥ |
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| अनुवाद |
| प्रात:काल उठकर अपने इन्द्रियों और वाणी को नियंत्रण में रखते हुए तथा श्रीभगवान् का स्मरण करके जो व्यक्ति चित्रकेतु का यह इतिहास पढ़ता है, वह बिना किसी कठिनाई के भगवान् के धाम को प्राप्त कर लेता है। |
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| प्रात:काल उठकर अपने इन्द्रियों और वाणी को नियंत्रण में रखते हुए तथा श्रीभगवान् का स्मरण करके जो व्यक्ति चित्रकेतु का यह इतिहास पढ़ता है, वह बिना किसी कठिनाई के भगवान् के धाम को प्राप्त कर लेता है। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध छह के अंतर्गत सत्रहवाँ अध्याय समाप्त होता है । |
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