श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  6.17.31 
वासुदेवे भगवति भक्तिमुद्वहतां नृणाम् ।
ज्ञानवैराग्यवीर्याणां न हि कश्चिद् व्यपाश्रय: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव कृष्ण की भक्ति में तल्लीन रहने वाले व्यक्ति स्वभावतः सर्वोच्च ज्ञान रखते हैं और इस भौतिक संसार से विरक्त रहते हैं। इसलिये ऐसे भक्त इस संसार के ना तो कथित सुख में कोई रुचि रखते हैं और न ही कथित दुःख में।
 
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव कृष्ण की भक्ति में तल्लीन रहने वाले व्यक्ति स्वभावतः सर्वोच्च ज्ञान रखते हैं और इस भौतिक संसार से विरक्त रहते हैं। इसलिये ऐसे भक्त इस संसार के ना तो कथित सुख में कोई रुचि रखते हैं और न ही कथित दुःख में।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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