| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य » अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप » श्लोक 29 |
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| | | | श्लोक 6.17.29  | देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया ।
सुखं दु:खं मृतिर्जन्म शापोऽनुग्रह एव च ॥ २९ ॥ | | | | | | अनुवाद | | परमेश्वर की बाह्य शक्ति के क्रियाकलाप के कारण जीव भौतिक देह के सम्पर्क में बँधकर रहता है। सुख व दुख, जन्म व मृत्यु, शाप व अनुग्रह की दोहरी प्रकृति इस भौतिक जगत में उसके सम्पर्क का स्वाभाविक परिणाम है। | | | | परमेश्वर की बाह्य शक्ति के क्रियाकलाप के कारण जीव भौतिक देह के सम्पर्क में बँधकर रहता है। सुख व दुख, जन्म व मृत्यु, शाप व अनुग्रह की दोहरी प्रकृति इस भौतिक जगत में उसके सम्पर्क का स्वाभाविक परिणाम है। | | ✨ ai-generated | | |
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