श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  6.17.25 
श्रीशुक उवाच
इति प्रसाद्य गिरिशौ चित्रकेतुररिन्दम ।
जगाम स्वविमानेन पश्यतो: स्मयतोस्तयो: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे कहते हैं - हे शत्रुदमन करने वाले राजा परीक्षित! शिवजी तथा पार्वती को प्रसन्न करने के बाद चित्रकेतु अपने विमान पर बैठ गया और उनके देखते-देखते प्रस्थान कर गया। जब शिवजी और पार्वती ने देखा कि शाप के बाद भी चित्रकेतु निर्भय है, तो वे उसके व्यवहार पर आश्चर्यचकित होकर मुस्कुराए।
 
श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे कहते हैं - हे शत्रुदमन करने वाले राजा परीक्षित! शिवजी तथा पार्वती को प्रसन्न करने के बाद चित्रकेतु अपने विमान पर बैठ गया और उनके देखते-देखते प्रस्थान कर गया। जब शिवजी और पार्वती ने देखा कि शाप के बाद भी चित्रकेतु निर्भय है, तो वे उसके व्यवहार पर आश्चर्यचकित होकर मुस्कुराए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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