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श्लोक 6.17.19  |
नैवात्मा न परश्चापि कर्ता स्यात् सुखदु:खयो: ।
कर्तारं मन्यतेऽत्राज्ञ आत्मानं परमेव च ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस संसार में, न तो जीव स्वयं और न ही अन्य लोग (मित्र और शत्रु) भौतिक सुख-दुःखों का कारण हैं। परंतु अज्ञानता के कारण जीव यह सोचता है कि वह और अन्य लोग इसके कारण हैं। |
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| इस संसार में, न तो जीव स्वयं और न ही अन्य लोग (मित्र और शत्रु) भौतिक सुख-दुःखों का कारण हैं। परंतु अज्ञानता के कारण जीव यह सोचता है कि वह और अन्य लोग इसके कारण हैं। |
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