श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  6.17.14 
नायमर्हति वैकुण्ठपादमूलोपसर्पणम् ।
सम्भावितमति: स्तब्ध: साधुभि: पर्युपासितम् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
यह व्यक्ति अपनी उपलब्धियों के कारण अत्यंत अभिमानी हो गया है और सोचता है कि "मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ"। वह भगवान विष्णु के चरण-कमलों की शरण लेने का अधिकारी नहीं है, जिनकी पूजा सभी संत करते हैं, क्योंकि वह अपनी महानता के अहंकार में डूबा हुआ है।
 
यह व्यक्ति अपनी उपलब्धियों के कारण अत्यंत अभिमानी हो गया है और सोचता है कि "मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ"। वह भगवान विष्णु के चरण-कमलों की शरण लेने का अधिकारी नहीं है, जिनकी पूजा सभी संत करते हैं, क्योंकि वह अपनी महानता के अहंकार में डूबा हुआ है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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