श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  6.17.13 
एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं
जगद्गुरुं मङ्गलमङ्गलं स्वयम् ।
य: क्षत्रबन्धु: परिभूय सूरीन्
प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड्य: ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि इस चित्रकेतु ने भगवान शिव का तिरस्कार करके ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं को मात कर दिया है, जो उनके चरण कमलों पर बैठकर उनका ध्यान धरते रहते हैं, इसलिए यह चित्रकेतु में घोर निकृष्ट है। भगवान शिव साक्षात् धर्मतत्व तथा पूरे जगत के गुरु हैं, अत: चित्रकेतु दण्डनीय है।
 
क्योंकि इस चित्रकेतु ने भगवान शिव का तिरस्कार करके ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं को मात कर दिया है, जो उनके चरण कमलों पर बैठकर उनका ध्यान धरते रहते हैं, इसलिए यह चित्रकेतु में घोर निकृष्ट है। भगवान शिव साक्षात् धर्मतत्व तथा पूरे जगत के गुरु हैं, अत: चित्रकेतु दण्डनीय है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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