श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  6.17.10 
इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्वशोभनम् ।
रुषाह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
शिवजी और पार्वती के शौर्य (वीर्य) को न जानते हुए राजा चित्रकेतु ने उन पर तीखी आलोचना की। उनकी बोली कुछ भी अच्छी नहीं लगी, इसलिए अत्यंत क्रोधित देवी पार्वती ने चित्रकेतु से, जो इंद्रियों के नियंत्रण में खुद को शिवजी से श्रेष्ठ समझ रहे थे, इस प्रकार कहा।
 
शिवजी और पार्वती के शौर्य (वीर्य) को न जानते हुए राजा चित्रकेतु ने उन पर तीखी आलोचना की। उनकी बोली कुछ भी अच्छी नहीं लगी, इसलिए अत्यंत क्रोधित देवी पार्वती ने चित्रकेतु से, जो इंद्रियों के नियंत्रण में खुद को शिवजी से श्रेष्ठ समझ रहे थे, इस प्रकार कहा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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