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श्लोक 6.17.1  |
श्रीशुक उवाच
यतश्चान्तर्हितोऽनन्तस्तस्यै कृत्वा दिशे नम: ।
विद्याधरश्चित्रकेतुश्चचार गगने चर: ॥ १ ॥ |
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| अनुवाद |
| श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा- जिस दिशा में भगवान अनंत विलीन हो गए थे, उस दिशा की ओर प्रणाम करके राजा चित्रकेतु ने विद्याधरों का नेतृत्व करते हुए अंतरिक्ष की यात्रा शुरू की। |
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| श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा- जिस दिशा में भगवान अनंत विलीन हो गए थे, उस दिशा की ओर प्रणाम करके राजा चित्रकेतु ने विद्याधरों का नेतृत्व करते हुए अंतरिक्ष की यात्रा शुरू की। |
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