श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  6.16.9 
एष नित्योऽव्यय: सूक्ष्म एष सर्वाश्रय: स्वद‍ृक् ।
आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभु: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
संसार में जीवात्मा नित्य तथा अविनाशी है क्योंकि इसका ना तो कोई आरम्भ है और ना ही कोई अन्त। न तो इसका जन्म होता है और ना ही मृत्यु। यह समस्त प्रकार की देहों का मूल है, किन्तु यह देहों की श्रेणी में नहीं आता। जीवात्मा अत्यन्त महान और पवित्र है जो कि परमात्मा के समान सद्गुणों से परिपूर्ण है। फिर भी, यह अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण बहिरंगा शक्ति से प्रभावित होता रहता है, और अपनी इच्छाओं के अनुसार अपने लिए विभिन्न शरीरों का निर्माण करता रहता है।
 
The soul is eternal and indestructible because it has no beginning or end. It is neither born nor dies. It is the origin of all types of bodies, yet it is not counted in the physical category. The soul is so high that it has the same religion as the Supreme Soul. Still, being very subtle, it keeps getting fascinated by external power and creates different bodies for itself according to its desires.
तात्पर्य
इस श्लोक में अचिंत्य-भेदाभेद-तत्व का वर्णन किया गया है-साथ-साथ एकता और भेद। जीव ईश्वर की तरह शाश्वत (नित्य) है, लेकिन अंतर यह है कि सर्वोच्च भगवान सबसे महान हैं, कोई भी उनसे बड़ा या उनके बराबर नहीं है, जबकि जीव सूक्ष्म या बहुत छोटा है। शास्त्र बताता है कि जीव का आकार केशाग्र के दस हज़ारवें हिस्से जितना है। सर्वोच्च भगवान सर्वव्यापी हैं (अंडांतरा स्थ परमाणु चयांतर स्थितम). अपेक्षाकृत, यदि जीव को सबसे छोटा माना जाए, तो स्वाभाविक रूप से सबसे बड़े के बारे में पूछताछ होनी चाहिए। सबसे महान सर्वोच्च भगवान हैं, और सबसे छोटा जीव है।

जीव की एक और अजीब विशेषता यह है कि वह माया से ढक जाता है। आत्ममाया गुणैः: वह सर्वोच्च भगवान की भ्रामक ऊर्जा से ढके जाने की ओर प्रवृत्त होता है। जीव भौतिक जगत में अपने सशर्त जीवन के लिए जिम्मेदार है, और इसलिए उसे प्रभु ("स्वामी") के रूप में वर्णित किया गया है। यदि वह चाहता है तो वह इस भौतिक जगत में आ सकता है, और यदि वह चाहता है तो वह घर लौट सकता है, भगवान के पास वापस जा सकता है। क्योंकि वह इस भौतिक जगत का आनंद लेना चाहता था, सर्वोच्च भगवान ने उसे भौतिक ऊर्जा की एजेंसी द्वारा एक भौतिक शरीर दिया। जैसा कि भगवान ने स्वयं भगवद्-गीता (18.61) में कहा है:

ईश्वर: सर्व भूतां हृद देशे अर्जुन तिष्ठति

भ्रामयन सर्व भूतानि

यंत्रारुधाणि मायाया

"सर्वोच्च भगवान हर किसी के हृदय में स्थित हैं, हे अर्जुन, और सभी जीवों की भटकन का निर्देशन कर रहे हैं, जो एक यंत्र पर सवार हैं, जो भौतिक ऊर्जा से बना है।" सर्वोच्च भगवान जीव को इस भौतिक जगत में अपनी इच्छानुसार आनंद लेने का मौका देते हैं, लेकिन वह अपनी इच्छा को खुले तौर पर व्यक्त करते हैं कि जीव सभी भौतिक आकांक्षाओं को छोड़ दे, पूरी तरह से उनके प्रति समर्पण कर दे और घर लौट जाए, भगवान के पास वापस जाएं।

जीव सबसे छोटा (सूक्ष्म) होता है। जीव गोस्वामी इस संबंध में कहते हैं कि शरीर के भीतर के जीव को भौतिकवादी वैज्ञानिकों के लिए खोजना बेहद मुश्किल है, हालाँकि हम अधिकारियों से समझते हैं कि जीव शरीर के भीतर है। शरीर जीव से भिन्न है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)