श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  6.16.58 
लब्ध्वेह मानुषीं योनिं ज्ञानविज्ञानसम्भवाम् ।
आत्मानं यो न बुद्ध्येत न क्‍वचित्क्षेममाप्नुयात् ॥ ५८ ॥
 
 
अनुवाद
वैदिक साहित्य और उसके व्यवहार से आत्म-साक्षात्कार द्वारा मनुष्य जीवन में सिद्धि प्राप्त कर सकता है। यह विशेष रूप से भारत में पैदा होने वाले मनुष्य के लिए संभव है। ऐसी सुविधाजनक स्थिति में जन्म लेने वाला व्यक्ति जो खुद को नहीं जानता, वह सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने में असमर्थ रहता है, चाहे वह ऊंचे ग्रहों में जीवन के लिए क्यों न चला जाए।
 
A person can achieve success in his life by self-realization through Vedic knowledge and its practice. This is especially possible for a person born in India. A person who is born in such a suitable situation and does not know himself is unable to achieve the ultimate success even if he reaches heaven.
तात्पर्य
हि कथन चैतन्य-चरितामृते में प्रतिपादित है (आदि ९.४१)। भगवान चैतन्य ने कहा था:

भारत-भूमि में हैला मनुष्य-जनम यारा

जनम सार्थक करि' कर पर-उपकार

भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति, विशेषकर अगर यह जन्म मानव-जन्म है, वेदों और उनके व्यावहारिक उपयोग द्वारा उच्चतम सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। जब कोई आदर्श हो जाता है, तो वह समस्त मानव-समाज के आत्म-साक्षात्कार के लिए सेवा कर सकता है। मानवीय कार्य करने के लिए यही सर्वश्रेष्ठ तरीका है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)