श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  6.16.56 
उभयं स्मरत: पुंस: प्रस्वापप्रतिबोधयो: ।
अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत्परम् ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
यदि स्वप्न में देखे गये विषय मात्र परमात्मा द्वारा देखे गये विषय हैं, तो फिर जीवात्मा, जो परमात्मा से पृथक है, स्वप्नों के क्रियाकलापों को कैसे याद रख सकता है? एक व्यक्ति के अनुभव दूसरे को नहीं समझाए जा सकते। अत: तथ्यों का ज्ञाता, जीवात्मा जो स्वप्न और जागृति की घटनाओं की जांच-पड़ताल करता है, परिस्थितिजन्य कार्यों से पृथक है। वह जानने वाला तो ब्रह्म है। दूसरे शब्दों में, जानने का गुण, जीवों और परमात्मा से संबंधित है। इसलिए जीवात्मा भी स्वप्न और जागृति की घटनाओं का अनुभव कर सकता है। दोनों अवस्थाओं में भी ज्ञाता वही रहता है पर गुण रुप में वह परब्रह्म के सामान ही होता है।
 
If the dreams seen during sleep are the subjects seen by the Supreme Soul, then why does the soul, which is separate from the Supreme Soul, remember the activities of dreams? The experiences of one person cannot be understood by another. Therefore, the soul, which is the knower of facts and inquires about the events that appear in dreams and awakening, is separate from the accidental actions. The knower is Brahman. In other words, the quality of knowing belongs to the soul and the Supreme Soul. Therefore, the soul can also experience the events of dreams and awakening. In both the states, the knower remains the same and in quality he is one with the Supreme Brahman.
तात्पर्य
ज्ञान में, जीवित प्राणी गुणवत्तापूर्वक परम ब्रह्म के साथ एक है, लेकिन परम ब्रह्म की मात्रा जीवित प्राणी के समान नहीं है, जो ब्रह्म का अंश है। चूँकि जीवित प्राणी गुणवत्ता में ब्रह्म है, वह सपनों की पिछली गतिविधियों को याद रख सकता है और जागरण की वर्तमान गतिविधियों को भी जान सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)