अकाम: सर्व-कामो वा
मोक्ष-काम उदार-धीः
तीव्रेण भक्ति-योगेन
यजेत पुरुषं परम
"चाहे सभी भौतिक इच्छाओं से भरा हो, भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो या मुक्ति की इच्छा रखता हो, एक व्यक्ति जिसके पास व्यापक बुद्धि है, उसे हर तरह से सर्वोच्च समग्र, भगवान का व्यक्तित्व पूजा करना चाहिए।" (भागवत 2.3.10) यह एक पूर्ण मानव होने का कर्तव्य है। जिसके पास मनुष्य का रूप है, लेकिन जिसके कार्य मात्र पशु के हैं, उसे नर-पशु या द्विपद-पशु, दो पैरों वाला पशु कहते हैं। मनुष्य जो कृष्ण चेतना में रुचि नहीं रखता है, उसे यहाँ एक नर-पशु के रूप में निंदा की जाती है।
