श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  6.16.38 
विषयतृषो नरपशवो
य उपासते विभूतीर्न परं त्वाम् ।
तेषामाशिष ईश
तदनु विनश्यन्ति यथा राजकुलम् ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवन्, हे परमेश्वर! इन्द्रियतृप्ति के भूखे और विभिन्न देवताओं की पूजा करने वाले अज्ञानी लोग नर-रूप में पशुओं के समान हैं। पशुओं जैसी अपनी प्रवृत्ति के कारण, वे आपके प्रति पूजा करने में असफल रहते हैं और इसके बजाय, वे तुच्छ देवताओं की पूजा करते हैं, जो आपके यश की छोटी-छोटी चिंगारियाँ मात्र हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड के नाश के साथ, देवताओं सहित, देवताओं से प्राप्त आशीर्वाद भी नष्ट हो जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे एक राजा के सत्ता से हटने पर, उसके राजकीय अधिकारी भी नष्ट हो जाते हैं।
 
O Lord, O Supreme Lord! Ignorant men hungry for sense gratification and worshiping various gods are like animals in human form. Due to their bestial nature, instead of worshiping You, they worship insignificant gods who are like small sparks of Your glory. With the destruction of the entire universe, these gods and the blessings received from them perish just like the royal officials when the king loses his power.
तात्पर्य
भगवद्-गीता (7.20) में कहा गया है, कामैस्तैस्तैर्हृता ज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्य-देवताः: "जिन लोगों का मन भौतिक इच्छाओं से विकृत हो गया है, वे देवताओं को समर्पण करते हैं।" इसी तरह, यह पद देवताओं की पूजा की निंदा करता है। हम देवताओं के प्रति अपना सम्मान दिखा सकते हैं, लेकिन देवता पूजनीय नहीं हैं। देवताओं की पूजा करने वालों की बुद्धि नष्ट हो जाती है (हृता ज्ञानाः) क्योंकि ये उपासक यह नहीं जानते कि जब संपूर्ण भौतिक ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का विनाश हो जाता है, तो देवता, जो उस अभिव्यक्ति के विभागीय प्रमुख हैं, जीत जाएंगे। जब देवता हार जाते हैं, तो देवताओं द्वारा अविवेकी लोगों को दिए गए वरदान भी नष्ट हो जाएंगे। इसलिए एक भक्त को देवताओं की पूजा करके भौतिक संपन्नता प्राप्त करने के लिए हठ नहीं करना चाहिए, बल्कि भगवान की सेवा में संलग्न होना चाहिए, जो उसकी सभी इच्छाओं को पूरा करेगा।

अकाम: सर्व-कामो वा

मोक्ष-काम उदार-धीः

तीव्रेण भक्ति-योगेन

यजेत पुरुषं परम

"चाहे सभी भौतिक इच्छाओं से भरा हो, भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो या मुक्ति की इच्छा रखता हो, एक व्यक्ति जिसके पास व्यापक बुद्धि है, उसे हर तरह से सर्वोच्च समग्र, भगवान का व्यक्तित्व पूजा करना चाहिए।" (भागवत 2.3.10) यह एक पूर्ण मानव होने का कर्तव्य है। जिसके पास मनुष्य का रूप है, लेकिन जिसके कार्य मात्र पशु के हैं, उसे नर-पशु या द्विपद-पशु, दो पैरों वाला पशु कहते हैं। मनुष्य जो कृष्ण चेतना में रुचि नहीं रखता है, उसे यहाँ एक नर-पशु के रूप में निंदा की जाती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)