श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  6.16.33 
तत: समाधाय मनो मनीषया
बभाष एतत्प्रतिलब्धवागसौ ।
नियम्य सर्वेन्द्रियबाह्यवर्तनं
जगद्गुरुं सात्वतशास्त्रविग्रहम् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् अपने ज्ञान के द्वारा मन को काबू करके और इन्द्रियों को बाहरी चीजों से दूर करके वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त शब्द ढूँढ सके। इस प्रकार वे भगवान की प्रार्थना करने लगे, जो वेदों के रूप हैं और अखिल गुरु हैं। उन्होंने इस प्रकार प्रार्थना की।
 
Thereafter, by controlling the mind with the help of his intelligence and withdrawing his senses from external objects, he was able to find suitable words to express his feelings. Thus, he started praising the Lord who is the manifestation of the scriptures (Brahma-Samhita and Sattvata Samhitas like Narada Pancharatra) and is the Guru of all. He praised as follows.
तात्पर्य
साधारण शब्दों से भगवान को प्रार्थना नहीं की जा सकती। मन और इंद्रियों को नियंत्रित करके आध्यात्मिक रूप से उन्नत होना चाहिए। तभी वह प्रभु को प्रार्थना करने के लिए उपयुक्त शब्द खोज सकता है। पद्म पुराण के निम्नलिखित श्लोक का उद्धरण देते हुए, श्रील सनातन गोस्वामी हमें किसी भी ऐसे गीत को गाने से मना करते हैं जिसे अधिकृत भक्तों ने नहीं गाया हो।

अवैष्णव-मुखोद्गीर्णं

पूतं हरि-कथामृतम्

श्रवणं नैव कर्तव्यं

सर्पोच्छिष्टं यथा पयः

जो व्यक्ति वैष्णव व्यवहार में स्थिर नहीं है, नियमों और विनियमों का कड़ाई से पालन नहीं करता है और हरे कृष्ण मंत्र का जाप नहीं करता है, उसके शब्दों या गीतों को शुद्ध भक्तों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। सात्वत-शास्त्र-विग्रह शब्द यह दर्शाते हैं कि प्रभु के सच्चिदानंद शरीर को माया से बना हुआ कभी नहीं माना जा सकता। भक्त प्रभु को काल्पनिक रूप में प्रार्थना नहीं करते। प्रभु के रूप के अस्तित्व का समर्थन सभी वैदिक साहित्य करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)