अवैष्णव-मुखोद्गीर्णं
पूतं हरि-कथामृतम्
श्रवणं नैव कर्तव्यं
सर्पोच्छिष्टं यथा पयः
जो व्यक्ति वैष्णव व्यवहार में स्थिर नहीं है, नियमों और विनियमों का कड़ाई से पालन नहीं करता है और हरे कृष्ण मंत्र का जाप नहीं करता है, उसके शब्दों या गीतों को शुद्ध भक्तों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। सात्वत-शास्त्र-विग्रह शब्द यह दर्शाते हैं कि प्रभु के सच्चिदानंद शरीर को माया से बना हुआ कभी नहीं माना जा सकता। भक्त प्रभु को काल्पनिक रूप में प्रार्थना नहीं करते। प्रभु के रूप के अस्तित्व का समर्थन सभी वैदिक साहित्य करते हैं।
