श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  6.16.29 
तत: कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगति: ।
जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, कुछ ही दिनों में, चित्रकेतु द्वारा जपे गए मंत्र के प्रभाव से, उसका मन आत्म-ज्ञान से अत्यधिक प्रकाशित हो गया और उसने अनंत देव के चरणों की शरण प्राप्त कर ली।
 
Thereafter, within a few days, due to the effect of the mantra chanted by Chitraketu, his mind became highly enlightened with self-knowledge and he took refuge at the feet of Ananta Deva.
तात्पर्य
किसी भक्त की अंतिम उपलब्धि आध्यात्मिक आकाश में किसी भी ग्रह में भगवान के कमल चरणों में शरण लेना है। भक्ति सेवा के कठोर निष्पादन के परिणामस्वरूप, भक्त को सभी भौतिक संपदाएँ प्राप्त होती हैं यदि उनकी आवश्यकता होती है; अन्यथा, भक्त भौतिक संपदाओं में रुचि नहीं रखता है, और न ही सर्वोच्च भगवान उन्हें पुरस्कृत करते हैं। जब एक भक्त वास्तव में भगवान की भक्ति सेवा में लगा होता है, तो उसकी स्पष्ट रूप से भौतिक सम्पत्ति भौतिक नहीं होती है; वे सभी आध्यात्मिक हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई भक्त एक सुंदर और महंगे मंदिर के निर्माण पर पैसा खर्च करता है, तो निर्माण भौतिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक होता है (निर्बंध कृष्ण-संबंधे युक्तं वैराग्य उच्यते)। एक भक्त का मन कभी भी मंदिर के भौतिक पक्ष में नहीं जाता है। मंदिर के निर्माण में उपयोग की जाने वाली ईंटें, पत्थर और लकड़ी आध्यात्मिक हैं, जैसे देवता, हालांकि पत्थर से बने होते हैं, पत्थर नहीं होते हैं बल्कि स्वयं परम व्यक्तिगत भगवान होते हैं। जितना अधिक कोई आध्यात्मिक चेतना में आगे बढ़ता है, उतना ही वह भक्ति सेवा के तत्वों को समझ सकता है। भक्ति सेवा में कुछ भी भौतिक नहीं है; सब कुछ आध्यात्मिक है। फलस्वरूप किसी भक्त को आध्यात्मिक उन्नति के लिए तथाकथित भौतिक संपदा से सम्मानित किया जाता है। यह संपदा आध्यात्मिक राज्य की ओर आगे बढ़ने में भक्त की मदद करने के लिए एक सहायता है। इस प्रकार महाराजा चित्रकेतु एक विद्याधर-पति, विद्याधरों के स्वामी के रूप में भौतिक संपदा में बने रहे, और भक्ति सेवा को निष्पादित करके वह कुछ ही दिनों में पूर्ण हो गए और भगवान शेष, अनंत के कमल चरणों की शरण लेकर घर लौटे, भगवान के पास।

एक कर्मी की भौतिक संपत्ति और एक भक्त की भौतिक संपत्ति एक ही स्तर पर नहीं होती है। श्रील माध्वाचार्य इस तरह से टिप्पणी करते हैं:

अन्यांतर्यामिणं विष्णुं

उपास्यान्‍या-समीपगः

भवेद योग्यतया तस्य

पदं वा प्राप्नुयान नरः

भगवान विष्णु की पूजा करके व्यक्ति वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है जो वह चाहता है, लेकिन एक शुद्ध भक्त कभी भी भगवान विष्णु से भौतिक लाभ के लिए नहीं पूछता है। इसके बजाय वह भगवान विष्णु की भौतिक इच्छाओं के बिना सेवा करता है और इसलिए अंततः आध्यात्मिक राज्य में स्थानांतरित हो जाता है। इस संबंध में, श्रील वीरराघव आचार्य टिप्पणी करते हैं, यथेष्ट-गतिरित्यर्थः: विष्णु की पूजा करने से, एक भक्त वह पा सकता है जो वह पसंद करता है। महाराजा चित्रकेतु केवल घर लौटना चाहता था, भगवान के पास, और इसलिए उसने उस तरह से सफलता प्राप्त की।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)