एक कर्मी की भौतिक संपत्ति और एक भक्त की भौतिक संपत्ति एक ही स्तर पर नहीं होती है। श्रील माध्वाचार्य इस तरह से टिप्पणी करते हैं:
अन्यांतर्यामिणं विष्णुं
उपास्यान्या-समीपगः
भवेद योग्यतया तस्य
पदं वा प्राप्नुयान नरः
भगवान विष्णु की पूजा करके व्यक्ति वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है जो वह चाहता है, लेकिन एक शुद्ध भक्त कभी भी भगवान विष्णु से भौतिक लाभ के लिए नहीं पूछता है। इसके बजाय वह भगवान विष्णु की भौतिक इच्छाओं के बिना सेवा करता है और इसलिए अंततः आध्यात्मिक राज्य में स्थानांतरित हो जाता है। इस संबंध में, श्रील वीरराघव आचार्य टिप्पणी करते हैं, यथेष्ट-गतिरित्यर्थः: विष्णु की पूजा करने से, एक भक्त वह पा सकता है जो वह पसंद करता है। महाराजा चित्रकेतु केवल घर लौटना चाहता था, भगवान के पास, और इसलिए उसने उस तरह से सफलता प्राप्त की।
