तत: स सप्तरात्रान्ते विद्यया धार्यमाणया ।
विद्याधराधिपत्यं च लेभेऽप्रतिहतं नृप ॥ २८ ॥
अनुवाद
हे राजा परीक्षित, ज्ञान में अपनी आध्यात्मिक उन्नति के मध्यवर्ती उत्पाद के रूप में, अपने गुरु से प्राप्त मंत्र को केवल एक सप्ताह तक बार-बार अभ्यास करने पर राजा चित्रकेतु ने विद्याधरों के ग्रह का शासन हासिल कर लिया।
O King Parikshit! After practising the mantra given by his Guru for only seven days, King Chitraketu attained the ultimate result of self-realisation and attained the kingdom of Vidyadhar Lok.
तात्पर्य
यदि एक भक्त, दीक्षा लेने के बाद, आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का कड़ाई से पालन करता है, तो वह स्वाभाविक रूप से वित्ताधिपत्यम और इसी तरह के पदों के भौतिक वैभव से सम्पन्न होता है। एक भक्त को सफल परिणाम प्राप्त करने के लिए योग, कर्म या ज्ञान का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं है। केवल भक्ति ही एक भक्त को सभी भौतिक शक्ति प्रदान करने के लिए सक्षम है। हालाँकि, एक शुद्ध भक्त कभी भी भौतिक शक्ति से जुड़ा नहीं होता है, यद्यपि वह व्यक्तिगत प्रयास के बिना इसे बहुत आसानी से प्राप्त कर लेता है। चित्रकेतु ने अपनी भक्ति सेवा का यह पक्ष लाभ प्राप्त किया, जिसे उन्होंने नारद के निर्देशों के अनुसार कड़ाई से किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥