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bhagavat 6.16.13: मृत बालक के शरीर के दाह-संस्कार व यथोचित अनुष्ठान सम्पन्न करने के बाद सम्बन्धियों ने उस स्नेह को भी त्याग दिया जिससे मोह, शोक, भय और दुख की प्राप्ति होती है। निस्संदेह, ऐसे स्नेह को त्याग पाना कठिन है, लेकिन उन्होंने आसानी से परित्याग कर दिया।   |   bhagavat अध्याय 6.16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट   ।   bhagavat स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  6.16.13 
निर्हृत्य ज्ञातयो ज्ञातेर्देहं कृत्वोचिता: क्रिया: ।
तत्यजुर्दुस्त्यजं स्‍नेहं शोकमोहभयार्तिदम् ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
मृत बालक के शरीर के दाह-संस्कार व यथोचित अनुष्ठान सम्पन्न करने के बाद सम्बन्धियों ने उस स्नेह को भी त्याग दिया जिससे मोह, शोक, भय और दुख की प्राप्ति होती है। निस्संदेह, ऐसे स्नेह को त्याग पाना कठिन है, लेकिन उन्होंने आसानी से परित्याग कर दिया।
 
After cremating the body of the dead child and completing the proper rituals, the relatives also abandoned the affection that results in attachment, grief, fear and sorrow. Undoubtedly, it is difficult to abandon such affection, but they abandoned it easily.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)