श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  6.16.10 
न ह्यस्यास्ति प्रिय: कश्चिन्नाप्रिय: स्व: परोऽपि वा ।
एक: सर्वधियां द्रष्टा कर्तृणां गुणदोषयो: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
इस जीव के लिए कोई भी प्रिय नहीं है और न ही कोई अप्रिय। वह अपने और दूसरे के बीच भेदभाव नहीं करता। वह अनन्य है, अर्थात मित्रों और शत्रुओं, शुभचिन्तकों और बुराई करने वालों से प्रभावित नहीं होता। वह केवल मनुष्यों के विभिन्न गुणों का निरीक्षक है।
 
This soul neither likes anyone nor dislikes anyone. It does not discriminate between its own and others. It is exclusive, that is, it is not influenced by friends and enemies, well-wishers or ill-wishers. It is merely a spectator or witness of the various qualities of human beings.
तात्पर्य
जैसे कि पिछले श्लोक में वर्णित किया गया है, जीवित संस्था में परम भगवान के समान गुण होते हैं, लेकिन उसके पास थोड़ी मात्रा में होता है क्योंकि वह एक छोटा कण (सूक्षम) है जबकि सर्वोच्च भगवान सर्वव्यापी और महान हैं। सर्वोच्च भगवान के लिए कोई मित्र, शत्रु या रिश्तेदार नहीं है, क्योंकि वह अज्ञानता के सभी अयोग्यताओं से पूरी तरह से मुक्त है जो वातानुकूलित आत्माओं की विशेषता है। दूसरी ओर, वह अपने भक्तों के प्रति बेहद दयालु और अनुकूल है, और वह उन लोगों से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं है जो उसके भक्तों से ईर्ष्या करते हैं। जैसा कि स्वयं भगवान भगवद-गीता (9.29) में पुष्टि करते हैं:

समो 'हम सर्व-भूतेषु

न मे द्वेष्यो 'स्ति न प्रियः

ये भजंती तु माम् भक्त्या

माय ते तेसु चाप्य अहम

"मैं किसी से ईर्ष्या नहीं करता, न ही मैं किसी के प्रति आंशिक हूं। मैं सभी के बराबर हूं। लेकिन जो कोई भी भक्ति में मेरी सेवा करता है, वह एक दोस्त है, वह मुझमें है, और मैं भी उसका दोस्त हूं।" सर्वोच्च भगवान का कोई दुश्मन या मित्र नहीं है, लेकिन वह एक भक्त की ओर झुका हुआ है जो हमेशा उनकी भक्ति सेवा में लगा रहता है। इसी तरह, गीता (16.19) में कहीं और भगवान कहते हैं:

ताँ अहम् द्विषतः क्रूरान

संसारेशु नराधमान

क्षिपाम्य अजस्रम अशुभान

ासुरीषु एव योनिषु

"जो ईर्ष्यालु और शरारती हैं, जो पुरुषों में सबसे नीच हैं, मेरे द्वारा भौतिक अस्तित्व के समुद्र में, जीवन की विभिन्न राक्षसी प्रजातियों में डाले जाते हैं।" भगवान उन लोगों के प्रति बेहद विरोधी हैं जो उनके भक्तों से ईर्ष्या करते हैं। अपने भक्तों की रक्षा के लिए, भगवान को कभी-कभी अपने दुश्मनों को मारना पड़ता है। उदाहरण के लिए, प्रह्लाद महाराज की रक्षा के लिए, भगवान को अपने दुश्मन हिरण्यकश्यपु को मारना पड़ा, हालाँकि हिरण्यकश्यपु भगवान द्वारा मारे जाने के कारण मोक्ष प्राप्त कर गया। चूँकि भगवान सभी की गतिविधियों के गवाह हैं, इसलिए वह अपने भक्तों के दुश्मनों के कार्यों का साक्षी बनता है, और वह उन्हें दंडित करने के लिए इच्छुक है। अन्य मामलों में, हालाँकि, वह केवल यह देखता है कि जीवित संस्थाएँ क्या करती हैं और किसी के पापी या पवित्र कार्यों का परिणाम देती हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)