श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  6.15.8 
देहदेहिविभागोऽयमविवेककृत: पुरा ।
जातिव्यक्तिविभागोऽयं यथा वस्तुनि कल्पित: ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
सामान्यीकरण और विशिष्टीकरण के विभाजन, जैसे राष्ट्रीयता और व्यक्तित्व, उन व्यक्तियों की कल्पनाएँ हैं, जो ज्ञान में उन्नत नहीं हैं।
 
General and specific divisions like nationality and personal power are the imaginations of people who are not advanced in knowledge.
तात्पर्य
वास्तव में दो शक्तियाँ हैं - भौतिक और आध्यात्मिक। दोनों ही सदा-सर्वदा विद्यमान हैं क्योंकि ये शाश्वत सत्य, परम प्रभु से निःसृत हैं। चूँकि व्यक्ति आत्मा, व्यक्ति जीव, अनादि काल से अपनी मूल पहचान को भूलकर कार्य करना चाहता है, इसलिए वह भौतिक शरीरों में अलग-अलग स्थितियों को स्वीकार करता है और राष्ट्रीयता, समुदाय, समाज, प्रजाति आदि के विभिन्न विभागों के अनुसार नामित किया जा रहा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)