अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मक: ।
देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृत: ॥ २५ ॥
अनुवाद
शरीर की अवधारणा के कारण जीव आत्मा अपने शरीर में लीन रहता है, जो भौतिक तत्वों, पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कर्मेन्द्रियों का समूह है, मन सहित। मन के कारण जीव आत्मा को तीन प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं - अधिभौतिक, अधिदैविक और आध्यात्मिक। इसलिए यह शरीर सभी दुखों का मूल है।
Due to the body consciousness, the soul remains engrossed in its body, which is a collection of physical elements, five sense organs and five organs of action along with the mind. Due to the mind, the soul has to bear three types of sufferings- physical, supernatural and spiritual. Hence, this body is the root of all sufferings.
तात्पर्य
पंचम सर्ग (5.5.4) में अपने पुत्रों को निर्देश देते हुए ऋषभदेव ने कहा, असन्न अपि क्लेशदा आसा देहः: शरीर, यद्यपि अस्थायी है, भौतिक अस्तित्व के सभी दुखों का कारण है। जैसा कि पिछले श्लोक में बताया गया है, संपूर्ण भौतिक सृष्टि मानसिक कल्पना पर आधारित है। मन कभी-कभी हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि अगर हम एक ऑटोमोबाइल खरीदते हैं तो हम पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि जैसे भौतिक तत्वों का आनंद ले सकते हैं, जो लोहा, प्लास्टिक, पेट्रोल आदि के रूप में संयुक्त होते हैं। पाँच भौतिक तत्वों (पंच-भूतों) के साथ-साथ हमारी पाँच ज्ञान-संग्रह करने वाली इंद्रियों जैसे आँखें, कान और जीभ और हमारे पाँच सक्रिय इंद्रियों जैसे हाथ और पैरों के साथ काम करते हुए, हम भौतिक स्थिति में शामिल हो जाते हैं। इस प्रकार हम अध्यात्मिक, अधिदैविक और अधिभौतिक नामक कष्टों के अधीन हो जाते हैं। मन केंद्र है क्योंकि मन ये सभी चीजें बनाता है। हालाँकि, जैसे ही भौतिक वस्तु टकराती है, मन प्रभावित होता है, और हम पीड़ित होते हैं। उदाहरण के लिए, भौतिक तत्वों, कार्यशील इंद्रियों और ज्ञान-संग्रह करने वाली इंद्रियों के साथ हम एक बहुत अच्छी कार बनाते हैं, और जब कार किसी टक्कर में दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है, तो मन पीड़ित होता है, और मन के माध्यम से जीवित इकाई पीड़ित होती है। तथ्य यह है कि जीवित इकाई, मन के साथ मिलकर, भौतिक स्थिति बनाती है। क्योंकि पदार्थ विनाशकारी है, भौतिक स्थिति के माध्यम से जीवित इकाई को नुकसान होता है। अन्यथा, जीवित इकाई सभी भौतिक स्थितियों से अलग है। जब कोई ब्रह्म मंच पर आता है, आध्यात्मिक जीवन का मंच, यह पूरी तरह से समझते हुए कि वह एक आध्यात्मिक आत्मा है (अहं ब्रह्मास्मि), वह अब विलाप या लालच से प्रभावित नहीं होता है। जैसा कि भगवान भगवद-गीता (18.54) में कहते हैं: ब्रह्म-भूतो प्रसन्नत्मा न शोचति न काङ्क्षति "जो इस प्रकार तुरंत सर्वोच्च ब्रह्म का एहसास करता है और पूरी तरह से आनंदित हो जाता है। वह कभी विलाप नहीं करता या कुछ पाने की इच्छा नहीं करता।" भगवद-गीता (15.7) में भगवान कहते हैं: ममैवाँशो जीव-लोके जीव-भूतः सनातनः मनः-षष्ठानींद्रियाणि प्रकृति-स्थाति कर्षति "इस वातानुकूलित दुनिया में जीवित इकाइयाँ मेरे शाश्वत खंडित भाग हैं। सशर्त जीवन के कारण, वे छह इंद्रियों के साथ बहुत मेहनत कर रहे हैं, जिसमें मन भी शामिल है।" जीवित इकाई वास्तव में भगवान के व्यक्तित्व का हिस्सा और पार्सल है और भौतिक परिस्थितियों से अप्रभावित है, लेकिन क्योंकि मन (मनः) प्रभावित होता है, इंद्रियां प्रभावित होती हैं, और जीवित इकाई इस भौतिक दुनिया में अस्तित्व के लिए संघर्ष करती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥