ताँगेरा चरण सेवा भक्त-सने वास
जनमे जनमे हाय, ए अभिलाष
एक भक्त को हमेशा उन्नत भक्तों के संग में रहने और परंपरा प्रणाली द्वारा भगवान की सेवा करने की आकांक्षा करनी चाहिए। वृंदावन के महान गोस्वामियों के निर्देशों के माध्यम से श्री चैतन्य महाप्रभु के मिशन की सेवा करनी चाहिए। इसे ताँगेरे चरण सेवा कहते हैं। गोस्वामियों के चरण कमलों की सेवा करते हुए, भक्तों के संग (भक्तसने-वास) में रहना चाहिए। यह एक भक्त का व्यवसाय है। एक भक्त को भौतिक लाभ की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए या भौतिक हानि के लिए विलाप नहीं करना चाहिए। जब अंगिरा ऋषि और नारद ने देखा कि महाराज चित्रकेतु, एक उन्नत भक्त, अज्ञान के अंधकार में गिर गया था और अपने पुत्र के भौतिक शरीर के लिए विलाप कर रहा था, तो उन्होंने अपनी अकारण दया से उसे सलाह देने के लिए आकर उसे इस अज्ञान से बचाया।
एक और महत्वपूर्ण शब्द है ब्राह्मण्य। भगवान को कभी-कभी नमो ब्राह्मण्य-देवाय प्रार्थना द्वारा संबोधित किया जाता है, जो भगवान को प्रणाम करता है क्योंकि वह भक्तों द्वारा सेवा की जाती है। इसलिए इस छंद में कहा गया है, ब्राह्मण्य भगवद्-भक्तो नावासादितुम अर्हसि। यह एक उन्नत भक्त का लक्षण है। ब्रह्म-भूतो प्रसन्न आत्मा। एक भक्त के लिए - एक उन्नत, आत्म-साक्षात्कार वाली आत्मा - भौतिक उल्लास या विलाप का कोई कारण नहीं है। वह हमेशा सशर्त जीवन से परे होता है।
