श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  6.15.18-19 
इत्थं त्वां पुत्रशोकेन मग्नं तमसि दुस्तरे ।
अतदर्हमनुस्मृत्य महापुरुषगोचरम् ॥ १८ ॥
अनुग्रहाय भवत: प्राप्तावावामिह प्रभो ।
ब्रह्मण्यो भगवद्भ‍क्तो नावासादितुमर्हसि ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्! तुम भगवान् विष्णु के परम भक्त हो। किसी भौतिक वस्तु के नष्ट होने पर इस तरह से व्याकुल होना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। अतः हम दोनों तुम्हें इस मिथ्या विलाप से मुक्त करने के लिये आए हैं, जो अज्ञानता के अंधकार में डूबे रहने के कारण हुआ है। जो आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण हैं, उनके लिये इस तरह से भौतिक लाभ और हानि से प्रभावित होना सर्वथा अवांछनीय है।
 
O King, you are the greatest devotee of the Supreme Personality of Godhead. It is not appropriate for you to grieve in this manner for the loss of any material object. Therefore, we both have come to deliver you from this false grief, which has arisen due to your being immersed in the darkness of ignorance. It is absolutely undesirable for those who are endowed with spiritual knowledge to be affected by material gains and losses in this manner.
तात्पर्य
इस छंद के कई शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। शब्द महा-पुरुष उन्नत भक्तों और परमेश्वर को भी दर्शाता है। महा का अर्थ है "सर्वोच्च", और पुरुष का अर्थ है "व्यक्ति"। जो हमेशा सर्वोच्च प्रभु की सेवा में रत रहता है उसे महा-पौरुषिक कहते हैं। शुकदेव गोस्वामी और महाराज परीक्षित को कभी-कभी महा-पौरुषिक कहकर संबोधित किया जाता है। एक भक्त को हमेशा उन्नत भक्तों की सेवा में लगने की आकांक्षा करनी चाहिए। जैसा कि श्रील नरसिंह दास ठाकुर ने गाया है:

ताँगेरा चरण सेवा भक्त-सने वास

जनमे जनमे हाय, ए अभिलाष

एक भक्त को हमेशा उन्नत भक्तों के संग में रहने और परंपरा प्रणाली द्वारा भगवान की सेवा करने की आकांक्षा करनी चाहिए। वृंदावन के महान गोस्वामियों के निर्देशों के माध्यम से श्री चैतन्य महाप्रभु के मिशन की सेवा करनी चाहिए। इसे ताँगेरे चरण सेवा कहते हैं। गोस्वामियों के चरण कमलों की सेवा करते हुए, भक्तों के संग (भक्तसने-वास) में रहना चाहिए। यह एक भक्त का व्यवसाय है। एक भक्त को भौतिक लाभ की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए या भौतिक हानि के लिए विलाप नहीं करना चाहिए। जब अंगिरा ऋषि और नारद ने देखा कि महाराज चित्रकेतु, एक उन्नत भक्त, अज्ञान के अंधकार में गिर गया था और अपने पुत्र के भौतिक शरीर के लिए विलाप कर रहा था, तो उन्होंने अपनी अकारण दया से उसे सलाह देने के लिए आकर उसे इस अज्ञान से बचाया।

एक और महत्वपूर्ण शब्द है ब्राह्मण्य। भगवान को कभी-कभी नमो ब्राह्मण्य-देवाय प्रार्थना द्वारा संबोधित किया जाता है, जो भगवान को प्रणाम करता है क्योंकि वह भक्तों द्वारा सेवा की जाती है। इसलिए इस छंद में कहा गया है, ब्राह्मण्य भगवद्-भक्तो नावासादितुम अर्हसि। यह एक उन्नत भक्त का लक्षण है। ब्रह्म-भूतो प्रसन्न आत्मा। एक भक्त के लिए - एक उन्नत, आत्म-साक्षात्कार वाली आत्मा - भौतिक उल्लास या विलाप का कोई कारण नहीं है। वह हमेशा सशर्त जीवन से परे होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)