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श्लोक 6.14.56  |
त्वं तात नार्हसि च मां कृपणामनाथां
त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् ।
अञ्जस्तरेम भवताप्रजदुस्तरं यद्
ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम् ॥ ५६ ॥ |
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| अनुवाद |
| प्रिय पुत्र, मैं असहाय और बहुत दुखी हूँ। तुम्हें मेरा साथ नहीं छोड़ना चाहिए। केवल अपने शोकाकुल पिता की ओर देखो। हम दोनों असहाय हैं क्योंकि पुत्र के बिना हमें घोर नरक में कष्ट सहना पड़ेगा। तुम्ही एकमात्र सहारा हो जिसके बल पर हम इस अंधकारमय प्रदेश से उबर सकते हैं; इसलिए मेरी प्रार्थना है कि तुम निर्दयी यमराज के साथ और आगे मत जाओ। |
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| प्रिय पुत्र, मैं असहाय और बहुत दुखी हूँ। तुम्हें मेरा साथ नहीं छोड़ना चाहिए। केवल अपने शोकाकुल पिता की ओर देखो। हम दोनों असहाय हैं क्योंकि पुत्र के बिना हमें घोर नरक में कष्ट सहना पड़ेगा। तुम्ही एकमात्र सहारा हो जिसके बल पर हम इस अंधकारमय प्रदेश से उबर सकते हैं; इसलिए मेरी प्रार्थना है कि तुम निर्दयी यमराज के साथ और आगे मत जाओ। |
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