श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  6.14.49 
ततो नृपान्त: पुरवर्तिनो जना
नराश्च नार्यश्च निशम्य रोदनम् ।
आगत्य तुल्यव्यसना: सुदु:खिता-
स्ताश्च व्यलीकं रुरुदु: कृतागस: ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा परिक्षित! रानी के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ सुनकर राजमहल के सभी स्त्री-पुरुष आ गए। एक जैसे दुखी होकर वो भी रोने लगे। जिन रानियों ने विष पिलाया था, वो अपने अपराध को अच्छी तरह जानते हुए भी रोने का ढोंग करने लगीं।
 
हे राजा परिक्षित! रानी के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ सुनकर राजमहल के सभी स्त्री-पुरुष आ गए। एक जैसे दुखी होकर वो भी रोने लगे। जिन रानियों ने विष पिलाया था, वो अपने अपराध को अच्छी तरह जानते हुए भी रोने का ढोंग करने लगीं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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