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श्लोक 6.14.49  |
ततो नृपान्त: पुरवर्तिनो जना
नराश्च नार्यश्च निशम्य रोदनम् ।
आगत्य तुल्यव्यसना: सुदु:खिता-
स्ताश्च व्यलीकं रुरुदु: कृतागस: ॥ ४९ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजा परिक्षित! रानी के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ सुनकर राजमहल के सभी स्त्री-पुरुष आ गए। एक जैसे दुखी होकर वो भी रोने लगे। जिन रानियों ने विष पिलाया था, वो अपने अपराध को अच्छी तरह जानते हुए भी रोने का ढोंग करने लगीं। |
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| हे राजा परिक्षित! रानी के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ सुनकर राजमहल के सभी स्त्री-पुरुष आ गए। एक जैसे दुखी होकर वो भी रोने लगे। जिन रानियों ने विष पिलाया था, वो अपने अपराध को अच्छी तरह जानते हुए भी रोने का ढोंग करने लगीं। |
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