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श्लोक 6.14.47  |
तस्यास्तदाकर्ण्य भृशातुरं स्वरं
घ्नन्त्या: कराभ्यामुर उच्चकैरपि ।
प्रविश्य राज्ञी त्वरयात्मजान्तिकं
ददर्श बालं सहसा मृतं सुतम् ॥ ४७ ॥ |
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| अनुवाद |
| गहरे संताप में डूबकर नौकरानी अपने दोनों हाथों से अपनी छाती पीटने लगी और पछतावे के स्वर में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी। उसकी ऊँची आवाज़ सुनकर रानी फौरन आई और जब वह अपने बेटे के पास पहुँची, तो देखा कि वह अचानक ही मर चुका है। |
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| गहरे संताप में डूबकर नौकरानी अपने दोनों हाथों से अपनी छाती पीटने लगी और पछतावे के स्वर में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी। उसकी ऊँची आवाज़ सुनकर रानी फौरन आई और जब वह अपने बेटे के पास पहुँची, तो देखा कि वह अचानक ही मर चुका है। |
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