श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  6.14.47 
तस्यास्तदाकर्ण्य भृशातुरं स्वरं
घ्नन्त्या: कराभ्यामुर उच्चकैरपि ।
प्रविश्य राज्ञी त्वरयात्मजान्तिकं
ददर्श बालं सहसा मृतं सुतम् ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
गहरे संताप में डूबकर नौकरानी अपने दोनों हाथों से अपनी छाती पीटने लगी और पछतावे के स्वर में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी। उसकी ऊँची आवाज़ सुनकर रानी फौरन आई और जब वह अपने बेटे के पास पहुँची, तो देखा कि वह अचानक ही मर चुका है।
 
गहरे संताप में डूबकर नौकरानी अपने दोनों हाथों से अपनी छाती पीटने लगी और पछतावे के स्वर में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी। उसकी ऊँची आवाज़ सुनकर रानी फौरन आई और जब वह अपने बेटे के पास पहुँची, तो देखा कि वह अचानक ही मर चुका है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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